अब सफलता का या मूल मंत्र सिर्फ उनके लिए नही तमाम बिहारी माँ बाप का था
सोचती हूँ प्यार तो उन्हे भी बहुत था और परवाह भी बहुत करते थे भी मेरे लिए अच्छा क्या है इस बारे मे उनके और मेरे ख्याल बस अलग थे।
अब जब मेरी बेटी कक्षा दस के लिए हिंदी नही लेना चाह रही थी और मुझे समझाना पड़ा कि हिंदीभाषी होने के कारण हमारे करियर के लिए ये जरूरी है कि कम से कम दसवी कक्षा तक हिन्दी हो और उसका विरोध जारी था कि पढ़ना मुझे है तो मुझे जो लेना है वही लुंगी, बरबस ही पापा याद आ गए । वही स्थिति है और वही अंतर्विरोध ! फर्क सिर्फ इतना है कि आज उनकी जगह मुझे स्वीकारना है नई पीढी का फैसला।