Thursday, 19 September 2024

यादों मे भूलते से पिता

उम्र के चौथे दशक पर दस्तक देते हुए मा बाप कुछ ज्यादा ही याद आते हैं। अपने बच्चे के साथ पीढ़ियों का अंतर्विरोध और जेनेरेशन गैप  जैसे शब्द गाल पर वक़्त के खींचे वो थप्पड़ हैं जो हमने भी कभी अपने पापा के सामने रख दिये थे। तब वो असमर्थ थे हमारी बात समझने मे। नही समझ आता था पापा को कि उनके हिसाब से  सोचा समझा करिअर ग्राफ मै क्यों नही अपनाना चाहती। उस राह पर क्यों नही चलना चाहती जो उनके  हिसाब से सफल है। दसवी के बाद सीधे फिज़िक्स केमिस्ट्री और मैथ्स के साथ बायो ले लो, खटाक से मेडिकल दो और झटाक से डॉक्टर बन जाओ बस, यही उनका फॉर्मूला था सफलता के लिए। 
 अब सफलता का या मूल मंत्र सिर्फ उनके लिए नही तमाम बिहारी माँ बाप का था
 सोचती हूँ प्यार तो उन्हे भी बहुत था और परवाह भी बहुत करते थे भी मेरे लिए अच्छा क्या है इस बारे मे उनके और मेरे ख्याल बस अलग थे। 
अब जब मेरी बेटी कक्षा दस के लिए हिंदी नही लेना चाह रही थी और मुझे समझाना पड़ा कि हिंदीभाषी होने के कारण हमारे करियर के लिए ये जरूरी है कि कम से कम दसवी कक्षा तक हिन्दी हो और उसका विरोध जारी था कि पढ़ना मुझे है तो मुझे जो लेना है वही लुंगी,  बरबस ही पापा याद आ गए । वही स्थिति है और वही अंतर्विरोध ! फर्क सिर्फ इतना है कि आज उनकी जगह मुझे स्वीकारना है नई पीढी का फैसला।