दहक कवि ललकार कनिए,
क्रांति के तलवार चाही
आई मिथिलांचलक जनके
भैरवी हुंकार चाही॥- एन पंक्तियों को लिखने वाले क्रांतिकारी मैथिल कवि रूप नारायण चौधरी 'अनूप' जिस तरह गुमनामी में पूरी जिन्दगी छुपे रहे कि किसी पड़ोसी को भी पता न चला हो कि उनके आस पास वो शख्स रहता था जिसने सन सतहत्तर के जे पी आन्दोलन में प्रशासन की नींव हिला दी थी।
क्रान्ति का अव्ह्वाहन करने वाले, प्रगतिशील और धर्म निरपेक्ष कवि अनूप ने न सिर्फ शब्दों में अपने उसूलो को जिया बल्कि जीवन भर शंघर्ष को ही प्राण का पर्याय बनाये रहे। हालांकि वो बीजेपी के कट्टर समर्थक और बाजपेयी के प्रंशसक थे, फिर भी उनकी आत्मा उद्वेलित हो उठी जब धर्मान्धता के तूफ़ान में हिन्दू कारसेवको ने बाबरी मस्जिद को नष्ट कर डाला:
"मंदिर मस्जिद गुरुद्वारों में बांटो मत भगवान् को,
मज़हब की दीवार खड़ी कर बांटो मत इंसान को।
हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, एक चमन के फूल हैं,
खिलने दो, खिल कर हसने दो कलि कलि के प्राण को।
चार फरबरी १९४५ को बसंतपंचमी के दिन, दरभंगा जिले कि पंचोभ गाँव में कवि अनूप का जन्म हुआ था। बचपन से ही उनकी बहुमुखी प्रतिभा चन्दन कि तरह मिथिलांचल को सुवासित करती रही। सातवी कक्षा में लिखी उनकी कविता 'सिनुरिया आम' आज भी कई बारे बूढों को याद आ जाती है। गाँव के पहले हाई स्कूल - देव नारायण उच्च विद्यालय के प्रथम बैच में अनूप कि प्रतिभा शुरू से ही उनके शिक्षको को चकित करती रही। चाहे सांस्कृतिक गतिविधियाँ हो, या वाद विवाद प्रतियोगिताये, हर जगह अनूप ने अपनी प्रतिभा सिद्ध की.
कवि अनूप ने बनारस हिन्दू विश्व विद्यालय से हिंदी में स्नातकोत्तर कि डिग्री प्राप्त की और साथ साथ दर्शनशास्त्र और संस्कृत में शास्त्री की उपाधि भी ली. प्रतिभाशाली अनूप अपने गुरु हजारी प्रसाद द्वेदी के चाहते शिष्य थे। बी एच यू में पढाई के दौरान भी उन्होंने सांस्कृतिक मंचो पर विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व किया.
एक प्रखर वक्ता होने की वज़ह से वे राजनितिक संगठनो की नजर में थे ..कई लोग उन्हें अपने दल में शामिल करना चाहते थे ..पर मूल रूप से उनका ह्रदय काव्य में बस्ता था और राजनितिक जीवन बहुत ज्यादा सफल नहीं रहा..आपातकाल के दौरान मीसा वारंट में उन्हें काफी दिन छुप कर रहना पड़ा था..ऊपर से अपने विद्यार्थियों के बीच वे बहुत लोकप्रिय थे, इसी वज़ह से छात्र आन्दोलन और आपातकाल के दौरान जब भी वे गिरफ्तार हुए उन्हें थाणे से छुड़ा लिया गया और वे जेल में कभी रहे नहीं..कुछ लोग बताते हैं की एक बार तो उन्हें गिरफ्तार करने वाले दारोगा को बेगुसराय की छात्राओं ने दुपट्टे से कुर्सी में बाँध दिया और थाणे से अपने प्रिय शिक्षक को ले आये...
उस समय राजनीति उनके सर चढ़ कर बोल रही थी..प्रदेश के कई नेता उन्हें अपने टक्कर का प्रतिद्वंदी भी मानते थे..लेकिन पारिवारिक जिम्मेदारियां भी मुह बाये खड़ी थीं..
कवि अनूप ने अपने करियर के शुरूआती दौर में एक कॉलेज में हिंदी पढ़ानी शुरू की और वहां भी वे छात्रो के बीच जल्दी ही प्रसिद्ध हो गए..लेकिन हर गलत बात पर विरोध करने की उनकी आदत यहाँ भी आड़े आई और जल्दी ही उन्होंने कॉलेज छोड़ कर स्कूल ज्वाइन कर लिया.