Sunday, 14 August 2011

पिता नही थे सिर्फ हमारे लिए तुम

पिता नही थे सिर्फ हमारे लिए तुम
एक बरगद जिसकी छांव में जीना सीखा
थाम कर उंगलिया सीखा इन पैरो ने चलना

और  सोचा था थामेंगे कभी
इन हाथों को भी मजबूती बन कर

हमारा होना..हमारा हंसना और हमारा रोना
जिसके लिए थी नेमत
और हम बने थे तुम्हारी हर कोशिश से

हमारे लिए वो नही था सिर्फ जाना तुम्हारा
मुस्कराते गए आखिरी सांस तक तुम
नीलकंठ सा सारा ज़हर समेट
तुम्ही ले गये वो सारी शुरुआते
द्वन्द, संघर्ष और दुःख भी
जो दूर किये रही पिता हमें तुमसे..

आँखे ढूंढती है पिता उन शब्दों को...
चिंता मत करो अभी हम जिन्दा हैं..
और कान भटकते हैं एहसास की खोज में
जो तुमसे होती थीं..ओउर कहती थी
मै फिर आऊंगा.....

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