पिता नही थे सिर्फ हमारे लिए तुम
एक बरगद जिसकी छांव में जीना सीखा
थाम कर उंगलिया सीखा इन पैरो ने चलना
और सोचा था थामेंगे कभी
इन हाथों को भी मजबूती बन कर
हमारा होना..हमारा हंसना और हमारा रोना
जिसके लिए थी नेमत
और हम बने थे तुम्हारी हर कोशिश से
हमारे लिए वो नही था सिर्फ जाना तुम्हारा
मुस्कराते गए आखिरी सांस तक तुम
नीलकंठ सा सारा ज़हर समेट
तुम्ही ले गये वो सारी शुरुआते
द्वन्द, संघर्ष और दुःख भी
जो दूर किये रही पिता हमें तुमसे..
आँखे ढूंढती है पिता उन शब्दों को...
चिंता मत करो अभी हम जिन्दा हैं..
और कान भटकते हैं एहसास की खोज में
जो तुमसे होती थीं..ओउर कहती थी
मै फिर आऊंगा.....
एक बरगद जिसकी छांव में जीना सीखा
थाम कर उंगलिया सीखा इन पैरो ने चलना
और सोचा था थामेंगे कभी
इन हाथों को भी मजबूती बन कर
हमारा होना..हमारा हंसना और हमारा रोना
जिसके लिए थी नेमत
और हम बने थे तुम्हारी हर कोशिश से
हमारे लिए वो नही था सिर्फ जाना तुम्हारा
मुस्कराते गए आखिरी सांस तक तुम
नीलकंठ सा सारा ज़हर समेट
तुम्ही ले गये वो सारी शुरुआते
द्वन्द, संघर्ष और दुःख भी
जो दूर किये रही पिता हमें तुमसे..
आँखे ढूंढती है पिता उन शब्दों को...
चिंता मत करो अभी हम जिन्दा हैं..
और कान भटकते हैं एहसास की खोज में
जो तुमसे होती थीं..ओउर कहती थी
मै फिर आऊंगा.....