Saturday, 15 October 2011

टू माय फादर अनूप: एक अज्ञात मैथिल क्रान्तिकारी कवि की कहानी

दहक कवि ललकार कनिए,
क्रांति के तलवार चाही
आई मिथिलांचलक जनके
भैरवी हुंकार चाही॥- एन पंक्तियों को लिखने वाले क्रांतिकारी मैथिल कवि रूप नारायण चौधरी 'अनूप' जिस तरह गुमनामी में पूरी जिन्दगी छुपे रहे कि किसी पड़ोसी को भी पता न चला हो कि उनके आस पास वो शख्स रहता था जिसने सन सतहत्तर के जे पी आन्दोलन में प्रशासन की नींव हिला दी थी।

क्रान्ति का अव्ह्वाहन करने वाले, प्रगतिशील और धर्म निरपेक्ष कवि अनूप ने न सिर्फ शब्दों में अपने उसूलो को जिया बल्कि जीवन भर शंघर्ष को ही प्राण का पर्याय बनाये रहे। हालांकि वो बीजेपी के कट्टर समर्थक और बाजपेयी के प्रंशसक थे, फिर भी उनकी आत्मा उद्वेलित हो उठी जब धर्मान्धता के तूफ़ान में हिन्दू कारसेवको ने बाबरी मस्जिद को नष्ट कर डाला:
"मंदिर मस्जिद गुरुद्वारों में बांटो मत भगवान् को,
मज़हब की दीवार खड़ी कर बांटो मत इंसान को।
हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, एक चमन के फूल हैं,
खिलने दो, खिल कर हसने दो कलि कलि के प्राण को।

चार फरबरी १९४५ को बसंतपंचमी के दिन, दरभंगा जिले कि पंचोभ गाँव में कवि अनूप का जन्म हुआ था। बचपन से ही उनकी बहुमुखी प्रतिभा चन्दन कि तरह मिथिलांचल को सुवासित करती रही। सातवी कक्षा में लिखी उनकी कविता 'सिनुरिया आम' आज भी कई बारे बूढों को याद आ जाती है। गाँव के पहले हाई स्कूल - देव नारायण उच्च विद्यालय के प्रथम बैच में अनूप कि प्रतिभा शुरू से ही उनके शिक्षको को चकित करती रही। चाहे सांस्कृतिक गतिविधियाँ हो, या वाद विवाद प्रतियोगिताये, हर जगह अनूप ने अपनी प्रतिभा सिद्ध की.

कवि अनूप ने बनारस हिन्दू विश्व विद्यालय से हिंदी में स्नातकोत्तर कि डिग्री प्राप्त की और साथ साथ दर्शनशास्त्र और संस्कृत में शास्त्री की उपाधि भी ली. प्रतिभाशाली अनूप अपने गुरु हजारी प्रसाद द्वेदी के चाहते शिष्य थे। बी एच यू में पढाई के दौरान भी उन्होंने सांस्कृतिक मंचो पर विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व किया.
एक प्रखर वक्ता होने की वज़ह से वे राजनितिक संगठनो की नजर में थे ..कई लोग उन्हें अपने दल में शामिल करना चाहते थे ..पर मूल रूप से उनका ह्रदय काव्य में बस्ता था और राजनितिक जीवन बहुत ज्यादा सफल नहीं रहा..आपातकाल के दौरान मीसा वारंट में उन्हें काफी दिन छुप कर रहना पड़ा था..ऊपर से अपने विद्यार्थियों के बीच वे बहुत लोकप्रिय थे, इसी वज़ह से छात्र आन्दोलन और आपातकाल के दौरान जब भी वे गिरफ्तार हुए उन्हें थाणे से छुड़ा लिया गया और वे जेल में कभी रहे नहीं..कुछ लोग बताते हैं की एक बार तो उन्हें गिरफ्तार करने वाले दारोगा को बेगुसराय की छात्राओं ने दुपट्टे से कुर्सी में बाँध दिया और थाणे से अपने प्रिय शिक्षक को ले आये...
उस समय राजनीति उनके सर चढ़ कर बोल रही थी..प्रदेश के कई नेता उन्हें अपने टक्कर का प्रतिद्वंदी भी मानते थे..लेकिन पारिवारिक जिम्मेदारियां भी मुह बाये खड़ी थीं..
कवि अनूप ने अपने करियर के शुरूआती दौर में एक कॉलेज में हिंदी पढ़ानी शुरू की और वहां भी वे छात्रो के बीच जल्दी ही प्रसिद्ध हो गए..लेकिन  हर गलत बात पर विरोध करने की उनकी आदत यहाँ भी आड़े आई और जल्दी ही उन्होंने कॉलेज छोड़ कर स्कूल ज्वाइन कर लिया. 

7 comments:

  1. It was trully said by my father "Anoop" kavita hriday se likhee jati hai...Shabd bhawnaoon se ukere jate hain...kavi hriday samwednnatmak srijan ki Saadhna karta hai.."Papa" hum aapke shabdon me hamare Sapnon ko jeena chate hain...Jo tum aa jate Ek baar,Path me bichh jate ban Paraag.....

    Aapke Shabdon ko hum apne jeevan ke ek ek kshan me Aatmsat karna chahte hain...

    Papa Tum to kahte the Main chand ko chhoo Sakti hoon,Suraj se Aankhen mila sakti hoon,Jharnon ka kalraw kalam me utaar sakti hoon,Kya tumhen nahin lagta ki abb ye navmallika ka phool jangal me hi murjha jayega...Khilne se pahle ...koi jan bhi na payega ki jangal me kabhi Navmallika ka phool khila tha..............Isse pahle ki ye navmallika Suvasit ho..Is sansar me apni pahchan banaye...Aap kahan chale gaye...Hum ek baar fir se aapke shabdon ko jeena chahte hain,khulkar hasna chate hain....Aapke sath thahake lagana chahte hain..."Hum panchee Unmukt Gagan ke,Pijarbaddh na gaa payenge...Kanakteeliyon se takrakar pulkit pankh toot jayenge..hum Bahta jal peene wale..mar jayenge bhukhe pyaase,kahee bhalee hai katuk nibauree Kanak katori ki maidaa se...

    "Shardhanjali to a Krantikari kavi,Jindadil Insaan,Nishchhal Hridaya,A sentiental ,romantice Poet,A real Secular,A great philospher,An inspiring teacher,A motivational Father...A devoted Son of his Mother,A helping,kind & good human being,A trully honest (who never compromised with his morality & honesty)..A blessing Son Of Maa Mithila..My father "ANOOP"

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    1. पापा को samarpit “अनूप स्मृति "
      ...हम उनके शब्दों को जीना चाहते हैं...
      हमारी प्रेरणा....
      हमारी कल्पना....
      हरा उत्साह...
      हमारा मनोबल.....
      उनके शब्द हैं.....
      " पापा जो तुम आ जाते एक बार..."
      पथ में बिछ जाते हम बन पराग...."
      फिर से हमें जीना सिखाते....
      फिर से हमें उड़ना सिखाते....
      फिर से हमें अपनी आकांछा बनाओ...
      फिर से हमें अपनी महत्वाकंछा बनाओ....
      क्यूँ चले गए इतनी दूर हमसे ....
      क्या इसलिए भरा था हम्मे कूट कूटकर आत्मविश्वास और हर संकट में लड़ने की हिम्मत !!!

      आपकी भाग्यशाली बिटिया....
      रश्मि

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  2. " kalpne kane matee par aaoo,bahut vicharlahun swapnlok mein,
    Sudhi Dharti ke bisarlahun...
    Aab ne Hamra KALIDAS ke ALKA me bharmaaoo...

    Kalpne kane matee par aaoo..."

    Tumhare shabd hain,ki kisi pawitra Gufageh me ukeree huee Kalpna hai...jo har ek kshan jeevant ho uthta hai..hamare sapno ke aangan me !
    Aao chalo fir se jiyen do pal sapnon ke Aangan me ...jeene ki aasha lekar...

    naye utsaah aur nayee umangon ke sath...

    bolo tum aaoge na...Mere sapnon ko fir se jinda karne.......PAPA tum yahin ho ,hare Sapnon ke sath...Aur aapne hi to kaha tha na ki "Sapne kabhi marte nahin !!!

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  3. Please write more about your Dad and his days beyond BHU ! How lucky to have someone like "Anoop" as your father.

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  4. shukriya..Planning to write a book or so..let'se when time comes for me to pay my real tribute to him..

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    1. shradhamjli ke suman arpit.....
      tujhpe ye jivan samarpit...
      saubhagya hai hamara humne aapko itne paas paaya...

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