पापा तुम तो कहते थे मैं चाँद को छू सकती हूँ ,
सूरज से आँखें मिला सकती हूँ,
झरनों का कलरव कलम में उतार सकती हूँ,
क्या तुम्हे नहीं लगता की अब ये नवमल्लिका का फूल
जंगल में ही मुरझा जायेगा......
खिलने से पहले....
कोई जान भी न पायेगा कि जंगल में
कभी नवमल्लिका का फूल खिला था...
इससे पहले की ये नवमल्लिका सुवासित हो....
इस संसार में अपनी पहचान बनाए ..आप कहाँ चले गए
...हम एक बार फिर से आपके शब्दों को जीना चाहते हैं,
खुलकर हसना कहते हैं....
आपके साथ ठहाके लगाना चाहते हैं..."
हम पंची उन्मुक्त गगन के, पिजर्बद्ध न गा पाएंगे...
कनक तीलियों से टकराकर पुलकित पंख टूट जायेंगे....
हम बहता जल पीने वाले
मर जायेंगे भूखे प्यासे,
कही भली है कटुक निबौरी कनक कटोरी कि मैदा से...... ----
सूरज से आँखें मिला सकती हूँ,
झरनों का कलरव कलम में उतार सकती हूँ,
क्या तुम्हे नहीं लगता की अब ये नवमल्लिका का फूल
जंगल में ही मुरझा जायेगा......
खिलने से पहले....
कोई जान भी न पायेगा कि जंगल में
कभी नवमल्लिका का फूल खिला था...
इससे पहले की ये नवमल्लिका सुवासित हो....
इस संसार में अपनी पहचान बनाए ..आप कहाँ चले गए
...हम एक बार फिर से आपके शब्दों को जीना चाहते हैं,
खुलकर हसना कहते हैं....
आपके साथ ठहाके लगाना चाहते हैं..."
हम पंची उन्मुक्त गगन के, पिजर्बद्ध न गा पाएंगे...
कनक तीलियों से टकराकर पुलकित पंख टूट जायेंगे....
हम बहता जल पीने वाले
मर जायेंगे भूखे प्यासे,
कही भली है कटुक निबौरी कनक कटोरी कि मैदा से...... ----
रश्मि प्रभा
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